Friday, 1 January 2016

जहाँ बाँटी जाए हरियाली

एक बात कहूँ, क्या मानोगे?
या अपनी-अपनी ठानोगे!
सूरज को कैसे बाटोगे?
क्या चन्दा को भी काटोगे!
•••••फिर,
ईश्वर को कैसे बाँट दिया?
क्या उसे भी हिस्सों में काट दिया?
फिर किसकी पूजा करते हो?
क्या मन्दिर-मस्जिद में धरते हो!
हिस्से-हिस्से पर लड़ते हो!
कहते हो पर नहीं डरते हो।
जब बाँटी जाए खुशहाली,
कैसे हो ईद औ दिवाली!

"दिवाकर" यह जान नहीं पाता,
क्यों मन्दिर-मस्जिद हैं खाली!
जहाँ बाँटी जाए हरियाली,
वहाँ कैसे रहे उसका "माली"।
                            -----------दिवाकर

नया सबेरा देकर वह उस पार गया।

वह आया
कुछ कदम साथ चला
और फिर हाथ छुड़ा
चला गया।

वह छोड़ गया
कुछ यादें-
खुशहाली के पल,
और कुछ
दर्द में डूबे छण।
इतिहास के पन्नों में
कुछ पन्ने जोड़ गया।

वह दिखा गया आईना।
आतंकवाद हो,
या हो कोई प्राकृतिक आपदा,
ये सब हमसे नहीं जुदा ।
आतूर हैं सब पाने को अधिकार,
पर करते कर्तव्य नहीं ।
सभ्यता पुरानी
पर अब तक हम सभ्य नहीं ।

कभी वह अपने साथ
छुड़ा ले गया
किसी अपने का साथ,
और कभी दे गया हाथ में
किसी अपने का हाथ।
ऐसे कुछ गाढ़े रंग
जीवन में ढार गया।
और
फिर से जीने को नया सबेरा
देकर वह उस पार गया।

"पप्पू" बैठा सोच रहा है !
कैसा था वह,
पर जैसा भी था
वह अपना सा कोई भला गया।

वह आया
कुछ कदम साथ चला
और फिर हाथ छुड़ा
चला गया।

          --------पप्पू