Wednesday, 27 July 2016

नन्हा सा ललना

सुन्दर-सलोने मुखड़े पर
       नन्ही-नन्ही अँखियाँ,
नन्ही-नन्ही अँखियों से
        टुकूर-टुकूर ताकना।

छोटे-छोटे हाथों में
      नन्ही-नन्ही उंगलियां,
उंगलियों से मुठ्ठियों को
      खोलना और बाँधना।

कोमल-कोमल होठों पर
      भावों की अंगड़ाईयाँ,
कभी-कभी रोना
             कभी मुस्कुराना।

आँचल का ओढ़ना
       गोद की बिछाईयाँ,
ममता की छाँव में
        नन्हा सा ललना।
               ----------------दिवाकर।
       ------हमारे प्यारे सुपुत्र के नाम
               //25/01/15

उनकी दुरी -उनकी याद

दुर होकर भी वे
        उतने ही करीब होते हैं।
जागते हैं  हम उनकी यादों मे,
ख्वाब  उनके ही भरे नयनों में
                        हम सोते हैं।

वे मेरे चाँद,
        मेरा प्यार गहरा आसमां,
दोनों हैं अधूरे सही
              एक-दूसरे के बिना ।

शांत  सागर में
    ज्यूं लहरें उमड़ के आती हैं,
उनकी यादें यूं ही
         मेरी धड़कनें बढ़ाती हैं ।

जिनसे मुलाकात नहीं
              कितने दिनों से सही,
वे ही  मेरे हर घड़ी -
       हर पल में शरीक होते हैं ।
दूर होकर भी वे
         उतने ही करीब होते हैं।।

वे हमसे दूर सही,
                फिर भी वे दूर नहीं ,
हम हैं मजबूर मगर
              दिल तो मजबूर नहीं।

वे ही कातिल हैं मेरे
            वे ही मेरी चाहत-ए-जाँ,
दर्द देते हैं वही
                  वही करते हैं दवा।

कत्ल जिनका हुआ,
          कातिल के मुरीद होते हैं,
दर्द जिनकी है दवा,
           चाहत-ए-मरीज होते हैं।
दूर होकर भी वे
            उतने ही करीब होते हैं।
                                  --------------दिवाकर
                           //25/02/15

आज मैं रंग भर दूं।

मेरे हृदय-पटल पर
                    रेखांकित तेरी तस्वीर।
                    आज मैं रंग 🎨 भर दूं।
कर दूं उसे सजीव
                          जरा उमंग भर दूं।

कोमल अधरों पर
                          भर दू्ं रंग गुलाबी।
रहे छलकती मादकता
                            मन करें शराबी।

कोमल-चिकने गालों पर
                                रंग लाल मलूं।
यूं शर्माते-सकुचाते भाव
                                  सजा मचलूं।

रंग नीला,
                 तेरी आँखों की गहराई में,
रहूँ  बैठा मैं उनकी
                        पलक- परछाईं  में।

पिले रंग से
                    तेरा साज-श्रृंगार करूँ।
उज्ज्वलता का
                    मैं तेरा अंग-हार करूं।

वदन पे तेरे
                    हरे रंग की साड़ी डालूँ ,
यौवन की हरियाली को
                        कुछ और निखारूँ।

काले गहरे रंग से
                           तेरे केश सजाऊँ।
जिनके साए में जाकर
                          मैं खुद खो जाऊँ।

अपने अधूरे ख्वाबों में
                            मैं रंग 🎨 भर दूँ।
कर दूं उन्हें सजीव
                            जरा तरंग भर दूं।
मेरे हृदय-पटल पर
                       रेखांकित तेरी तस्वीर,
                    आज मैं रंग 🎨 भर दूँ।।
                                      *************दिवाकर
                                      //05/03/15

भीतर का इन्सान मर चूका

मांस-मांस चिल्लाने वालों
अपना मांस पकाकर चखना,
गौ, सूकर, बकरे के मांस में
अपना मांस मिलाकर चखना।
हिन्दू चखना, मुस्लिम चखना
बोटी-बोटी कर मजहब चखना,
इतने से भी मजा न आए
अपना खून मिलाकर चखना।
चंद सफेदपोशो के कुत्ते
चाट रहे हैं हाड-मांस तक,
उनके जीभ से जीभ सटाकर
अपना खून बहाकर चखना।

भीतर का इन्सान मर चुका,
उसकी लाश पकाकर चखना
                ------------------------दिवाकर
                //07/10/15

मतदान - वतन के नाम

हर तरफ हैं वतन पर साजिशो के कशूरवार,
हमारा मत उसको मिले जिसको किए का शर्म है।
मजहबी ठप्पा लगाने जा रहे हो तुम अगर,
भूल जाना यह नहीं कि "वतनपरश्ती" धर्म है।
                                  -------------दिवाकर
                            //28/10/2015

Tuesday, 26 July 2016

तुम जी गये हो मृत्यु के बाद भी

तुम जी गये हो
मृत्यु के बाद भी,
जैसे निर्भया जी गयी थी।
सब कहाँ जी पाते हैं ऐसे!
तुम सड़कों पर,
अखबारों में,
सोशल साईट्स पर,
टेलीविजन पर
छा गये हो।
जैसे निर्भया छा गयी थी।
सब कहाँ छाते हैं ऐसे!
तुमने लिखा अपना दर्द,
जोड़ा नहीं किसी पर दोष,
पर
दर्द ने तो जोड़ रखा है
दलों से नाता,
यूँ ही नहीं तुम
राजनीति को भा गये हो।
जैसे निर्भया भा गयी थी।
सब कहाँ भाते हैं ऐसे!

तुममे और निर्भया में
सिर्फ आत्महत्या और हत्या का फर्क है,
बाकी सब कुछ एक जैसा।
हाँ एक जैसे ही
तुमसे उपजे कथित
दलीय-दर्द मिट जाएंगे।
राजनीतिक-पटल से हट जाएंगे।
हाँ एक जैसे ही
तुम्हारे दर्द जिन्दा रहेंगे
तुम्हारे बाद की आत्महत्याओं में,
बलात्कारों में, हत्याओं में।
परंतु
राजनीतिक स्वार्थ साधने में
असमर्थ
मरते ही मर जायेंगे।
तुम्हारे जैसे न ही
छा पायेंगे मीडिया में,
न ही लुभा पायेंगे राजनीति को,
वे तब अपने ही दर्द में
दफन हो जायेंगे।
                      -----------दिवाकर ।//20/01/16

सोशल -एन्टीसोशल

तुम
मुझे एक्सेप्ट मत करना
रिजेक्ट करना मुझे ।
कि, मैं बार-बार तुम्हारे प्रोफाईल
में जा सकूँ,
जान सकूँ हमारी असमानता,
जो कि अनदेखी रह गई थीं
जब तुम्हें रिक्वेस्ट भेजी थी-
तब केवल देखी थी,
तो सिर्फ समानता-
हमारे बीच की,
तब तुम मुझे
कुछ मेरे जैसे लगे थे,-
जो कि सच नहीं।
क्योंकि,
यदि यह सच होता तो
इतने सारे ग्रुप नहीं होते।
मेरा भी एक ग्रुप होगा,
जहाँ तुम रिजेक्ट किए जाओगे ।
इसी के लिए तुम मुझे एक्सेप्ट मत करना।
क्योंकि••••••••
तुम्हें एक्सेप्ट करने के लिए
मैं खूद को रिजेक्ट नहीं कर सकता ।
                                ----------दिवाकर ।
                                // 01/02/16

माँ, तुम विदा मत होना ।

हाँ,
तुम मूर्तरूप में
बैठती हो
हर वर्ष
हर चौक-चौराहे पर।
परंतु
अमूर्तरूप में
कहीं नहीं
कहीं भी नहीं-
न वाणी में
न ही विचार में ।
हाँ,
तुम्हारे विसर्जन से पहले ही
विसर्जित हो जाते हैं-
लोक-लाज,
नंगी हो जाती है सभ्यता,
उन अश्लील गीतों में
जो बजाये जाते हैं
तुम्हारे विसर्जन-जुलूस में
और उन गीतों पर
सरे-बाजार नाचती हैं
बहकी हुई बेशर्म कुन्ठाएँ
शहर भर की।
हाँ,
तुम्हारी मूर्ति-विसर्जन से पहले ही
विसर्जित कर दी जाती है
मर्यादा उस पवित्रता की
जिसे "माँ " कहते हैं ।
कड़वा सच है
कि तुम्हारी अमूर्त-रूप-दर्शनार्थ
न कोई योग्य द्रृष्टि बची है,
न ही तुम्हें पुकारने के योग्य
कोई जिह्वा।
हाँ,
जिह्वा, जिसने
"माँ" और "बहन" शब्दों की
मर्यादा भंग की
प्रयुक्त कर गालियों में,
अन्यथा
तुम्हारी अमूर्तता तो
अवश्य ही विद्यमान होती है
हर एक माँ में,
जो
परिलक्षित नहीं होती है
अयोग्य द्रृष्टि से।
हाँ,
द्रृष्टि
जिसने नहीं देखी
माँ की आँखों के कोने में
अटकी अश्रु-बूँद को,
नहीं महसूस की
उसकी विवशता को,
माँ की सिकुड़ी भौहों के नीचे
आँखों में ममता की छलछलाहट
नहीं देखी।

हाँ,
जिसके कदम ठिठके हैं
माँ की खामोशी भरी विदाई से,
जिसके हृदय ने ही पुकारा हो
माँ को कई बार
और खामोशी भी
रोक नहीं पायी हो उसे
माँ का हृदय छूने से,
वे सरस्वती-पुत्र जहाँ होंगे
वहीं विद्यमान होगी माँ
तुम अमूर्त रूप में ।
माँ ,
तुम वहां से विदा मत होना।

                         -----------दिवाकर ।//15/02/16

तब, माली चूप न रहेगा ।

फूल केवल फूल नहीं होता,

उसका एक रंग होता है -
तुम्हें शायद पसंद न हो।
उसमें एक खुशबू होती है -
तुम्हें शायद न भाती हो।
उसकी पंखुड़ियाँ होती हैं -
उनसे एलर्जी ही हो तुम्हें ।

फूल के साथ
काँटे भी हो सकते हैं,
और हो सकते हैं पत्ते भी -
कुछ हरे,
तो कुछ सुखे भी।

तो क्या!

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तुम्हें ।
फूल को जो चाहे कहो,
बदरंग कहो,
दुर्गंध कहो,
नीरस कहो,
काँटे कहो,
सूखा झाड़ कहो।

मगर
मत कहना
उसे तोड़ने की बात,
क्योंकि
तब माली चुप न रहेगा,
अड़ेगा, लड़ेगा, मरेगा,
मगर
फूल की पीड़ा
अब और न सहेगा।
                         ------------दिवाकर ।//18/02/16

मेरी-तबियत-घर की

फिर, मेरी तबियत बिगड़ी है ।

घर के भीतर बिखरी
अपनी ही चीजें
समेट रहा था ,

कि खबर आई
दहलीज की
फिर कुछ ईंटें उखड़ी हैं ।

घर के आँगन में
एक चबूतरा है,
जिस पर बैठते थे सब,
अपनी अपनी बातें कहते थे,
सबकी बातें सुनते थे ।

उसमें पड़ चुकी हैं कई दरारें,
जो अपनों के ही प्रहार से उभरी हैं ।

चबूतरे की हो
या हो दहलीज की,
अपनी ही तो है हर ईंट।

सोच रहा हूं -
कहीं तो नहीं,
बाहर-भीतर चोट करें जो
- दोनों हाथें -
एक ही देह ने पकड़ी हैं !

फिर, मेरी तबियत बिगड़ी है ।
--------------------------------------- दिवाकर ।
                                   //28/02/16

तुम नेता बन जाओगे ।

अपना माथा
खुला रखोगे,
औरों को
टोपी पहनाओगे,
तुम नेता बन जाओगे।

सभा करोगे,
जुलूस करोगे,
भीड़ के भीड़ लगाओगे,
तुम नेता बन जाओगे ।

देश की खातिर चिल्लाओगे-
कौन सुनेगा ?
अफजल अफजल चिल्लाओगे,
तुम नेता बन जाओगे ।

घर से दूर
सीमाओं पर
देश की खातिर
कष्ट सहोगे,
जान गँवाओगे,
फिर भी
याद न आओगे।
देश के भीतर
अपने घर से,
देश तोड़ने के
नारे लगवाओगे,
खूब नाम कमाओगे,
तुम नेता बन जाओगे ।

"तीन-रंगों" की
सलामी को
तारीखें ही काफी हैं,
मगर मीडिया में
चर्चा को
ये खबरें नाकाफी हैं ।
दोगे सलामी "खास रंग" को
चर्चा में आ जाओगे,
तुम नेता बन जाओगे।

वजहें जो भी हों-
बेमानी हैं,
जेल से होकर आओगे,
तुम नेता बन जाओगे ।
----------------------------- दिवाकर ।//06/03/16

आज के दिन-तू थोड़ा जी जाए।

नारी,
आज का दिन तुम्हारे लिए है,
तुम, जिसने अपने कोख से
जन्मा है संसार।
यही तुम्हारा संसार,
जो गिनता है दिन-
अपनी खुशियों के,
अपने दुःखों के।
जो बिते हुए दिन खींच लाता है,
रोता है, गाता है,
आने वाले दिन के
सपने सजाता है
और
खो जाता है
इतना
कि तुम्हें भूल जाता है ।
इन सब दिनों के बीच
आज का दिन
जरूर फुरसत का दिन होगा
जो तुम्हारे नाम कर दिया।

कितनी अजीब बात है न यह
कि तुम्हारे नाम एक दिन
कि जिसके बिना
हर एक पल अधूरा है ।

पिछले कुछ दिनों से
तुम रोई होगी बहुत,
काश कि आज भी महसूस की जा सकें-
तेरी सिसकियाँ।
तुझे भी "माँ" कहा है हमने-
कि आज के दिन
तेरे आँसू नहीं बहने पाएँ।
आज के दिन "भारत माँ "
तू थोड़ा जी जाए ।
----------------------------दिवाकर ।//08/03/16

पन्ने जलाते रहोगे।

ये पन्ने -
जो जलाये जा रहे हैं वर्षों से,
जलते हुए पन्नों
की लपटों में
जल जाती हैं किताबें भी।
और
किताबों के सब पन्ने
एक से नहीं होते,
और एक से नहीं होते
उनमें अंकित
हर अक्षर,
हर शब्द,
हर पंक्तियाँ।
जरूरी नहीं कि
कि सब तुम्हें सही लगें-
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
यह भी है ।
ये पन्ने हैं-
पढ़ने वालों के लिए ।
पढ़ने दो उन्हें,
सोचने दो,
फिर करने दो विचार उन्हें-
किस सोच को जलाना है
या किस सोच को बचाना है ।
हो सके तो
अशिक्षा जलाओ।

पन्ने जलाने से
सिर्फ राजनीति होगी,
नेता बनोगे
और
सत्ता बदल बदलकर
पन्ने जलाते रहोगे।
---------------------------- दिवाकर ।//09/03/16

"अंश"

घर मेरा धड़कता है
आजकल,
एक नन्ही सी
धड़कन के साथ ।

नन्हे-नन्हे पैरों की
थिरकन में
खो जाता है -
घर में बे-घर होने
का एहसास ।

नन्हे- नन्हे हाथों की
थपकियाँ
दिवारें खोल देती हैं ।

कोमल होंठों से
नवजात से निकलते हैं शब्द-
आर्द्रता में लिपटे,
सिमटे-सिमटे,
सकुचे-सकुचे-
घर के रोम-रोम को
तर कर देते हैं ।

नन्हीं-चमकीली आँखें
जिधर निहार भर लेती हैं,
घर वहीं रौशन हो जाता है ।

वह
घर के कोने कोने में
दिल सा बहता रहता है
कि,
उसका घर में होना ही
घर का पूरा होना है ।

उसको जब-जब मैं
गोद में लेता हूं,
मन-दर्पण में
बार बार निहारता हूं-
तो पाता हूं-
अपने ही अंबर में
चाँद चमक रहा है ।
--------------------------दिवाकर ।//13/03/16

दामन में दाग

माँ,
तेरे आँचल की
छाँव में
कुछ चिढ़े हुए बच्चे भी हैं,
इतने चिढ़े हुए-
कि
इन्हें तेरे दुध से भी
चोट आती है-
तो-
ये थुकते हैं-
कीचड़-
जिसकी छिटें
तेरे दामन को भी छुती हैं,
तो भी उन्हें
कोई ग्लानि नहीं ।
--------------------------दिवाकर ।//15/03/16

वजहें काफी हैं- "जीने की"

भीड़ कितनी भी हो
मगर उसमें भी
गुम हो जाने से बचने को
जगह बचती है।

किसी भी गाँठ की
हर आखिरी गिरह
खोल पाने की
जिरह बचती है।

गमों का पहाड़ ही
हो तो क्या
मुस्कुराहट के फुटने की
जुगत बचती है ।

खुदखुशी की वजह क्या होगी
जब खुद से ही
खुश होने की
वजह बचती है ।

दिल बड़ा हो तो
हमेशा ही
जीने की वजह बचती है ।

निराश होते हो भला क्यों यारों,
फिर से होने को
हमेशा ही
सुबह बचती है ।
-------------------- दिवाकर ।//20/03/16

"अंतर्वेदना"

हम हवाओं के भरोसे
किताब-ए-जिंदगी के
पन्ने पलटते रह गये।
आंधियाँ आयीं
किताबें ही
उड़ा कर ले गयीं ।

जो किताबों में लिखा था
पढ़ न पाए हम कभी।
अक्षरों की रौशनी में
चौंधियाए रह गये ।

फड़फड़ाकर रह गये
पन्नों में अपने ख्वाब सारे।
होश में आए तो
खालिस जिल्द तड़पती रही।

जब मिला उनसे-
जिसने पढ़ा मुझको कभी।
अपनी किताबों में
वे अपना मुंह छिपाए चल दिये।

-------------------------दिवाकर ।//22/03/16

"जोगी" मन रंगना

अबकी फागून
तन मत रंगना,
जोगी
मन रंगना।

आँधी, अंधड़ शोर कर रहे
सूखे पत्ते, धूल, भर रहे,
मूरझाए सब-
थे हरे-भरे ।
सूखा पड़ा है
प्रेम का अंगना,
जोगी मन रंगना।

उसका आना,
उसका जाना,
सब कुछ था
जाना पहचाना।
जबसे
टूट गए हैं कंगना,
उसका रहना
या न रहना,
सूना है अंगना।
जोगी मन रंगना।

हंस के लिए
पलकें बिछाईं,
कोयल कैसे
रास न आई,
अब कौओं की
काँव काँव से
फूर्र हुईं मैना ।
जोगी मन रंगना।

मन का आंगन
फिर से सजाना,
कोयल गाये गीत सुहाना,
फिर फिर आए बैठे मैना,
और खनके
खन खन खन कंगना।
जोगी मन रंगना।

अबकी फागून
तन मत रंगना,
जोगी
मन रंगना।
---------------दिवाकर//24/03/16

ऐसे, क्या "जय देश की"!

तुम हो अपनी भीड़ में,
हम हैं अपनी भीड़ में,
भीड़ के दायरों में
भेड़िए हम हो गये हैं ।

उठाते हैं उंगलियाँ भी तो-
लगती हैं खरोंचें-
एक दूसरे को।
अपने ही चित्कार में
हम खो गये हैं ।

कुछ तो जतन करके
निकलकर आएं बाहर
दायरों से,
कि-
अपने-अपने इंसानों के दुश्मन
हम क्यों हो गये हैं ?

खाल है जो भीड़ की
उसमें जलन है,
बेबसी है,
घूटन है,
घूट-घूट के इंसान मर न जाएँ,
कुछ भी करो
चिरो या फाड़ो,
बाहर निकालो,
साँस लेने दो इन्हें,
गले मिलने दो इनको
एक-दूसरे से।
मिलने-बिखरने दो इन्हें
एक-दूसरे में ।

देर होती है नहीं
जब तक संभल जाए कदम,
होश में आओ
कि भीड़ की साजिश है यह,
इंसान का दम घूटता है जहाँ,
हम ऐसी भीड़ के
क्यों हो गये हैं ।

भीड़ ही बस भीड़ हो,
इंसान न हो कोई जहाँ,
ऐसे क्या जय देश की,
या कि,
जयमाला में उसके भी
"विवशता", हम पिरो गये हैं ।
----------------------------------दिवाकर ।//27/03/16

दिल्ली जाते हुए

दिल्ली जाते हुए,
आज ताजा हो गयी हैं
यादें
दर्द की,
दिल की,
दिल्ली की।
आँखों में चढ़ती चमचमाहट के
चकाचौंध से
निकलने की
अनिच्छा के वजूद में
तन्हाई का अर्थ तलाशने
की जिद की याद
आज फिर
ताजा हो गयी ।
आज फिर ताजा हो गयी याद
दिल्ली के शाम के इंतजार की
सिर्फ जब
मैं मेरे साथ होता था,
बाकी सारा दिन
तुम्हारे साथ ,
तुम्हारे न होते हुए भी।
शादीपुर मेट्रो की सिढ़ियों पर
किनारे बैठे भिखारी के
गोद में रोते बच्चे के
भिखारी के हाथों पिटने
के दृश्य से बचकर
मेट्रो की भीड़ में भागने की याद,
और
वेशभूषा से भाषा तक
ब्रांड की झपकियों से
अभिभूत,
मेट्रो की भीड़ से भागने की याद
सब ताजा हो गयी हैं ।
वर्षों बाद
दिल्ली जाते हूए आज
मैं अकेला नहीं हूं ।
-------------------------दिवाकर ।//29/03/16

दिल्ली से आते हुए,

दिल्ली से आते हुए,
कुछ खाली सा हो गया है ।
वहाँ जो घट भर गया था
मुहाने तक,
छलछला गया था,
बज उठेगा जैसे
फूट-फूटकर,
कोई बजादे बस
दिल्ली से आते हुए ।
जो बचा है भीतर-
बेचैन है यह सोचकर
कि
यूँ भी ईश्वर किसी से
रूठता क्यों है?
किसीको आस होती है
गहरी किसीकी
उसे वह 
क्यों कभी मिलता नहीं है ।

दिल्ली से आते हुए
थोड़ा सा खुद को
वहीं छोड़ आया हूं,
जो बचा हूं-
बेचैन हूं,
दिल्ली से आते हुए ।
--------------------------दिवाकर ।//02/04/16

Saturday, 23 July 2016

राम-चरित्र-मानस


कोई राम से मिला हो
तो बताना,
किसी ने सीता के साथ
आँसू बहाए हों तो
मिलाना,
किसी ने तुलसीदास से
कोई चर्चा की हो तो
जरा मेरी परिचय कराना
उससे,
कि मैं जानना चाहता हूं
राम से रामचरितमानस हुआ
या कि
रामचरितमानस से राम !
आज न राम हैं,
न ही सीता,
न ही हैं तुलसीदास,
है तो बस रामचरितमानस,
जिसे पढ़नेवाले
बस कुछ पंक्तियाँ पढ़कर
गढ़ लेते हैं
अपने-अपने राम,
अपनी-अपनी सीता,
और फिर
मचाते हैं शोर
जिसमें रामचरितमानस के
चौपाइयों की मिठास
करूण क्रंदन बन जाती है ।
बस राम-रावण युद्ध की
चित्कार गुंजती है
जिसमें गूंगे हो जाते हैं-
भरत, केवट, शबरी
जैसे अनमोल पात्र।
राम केवल सीता, लक्ष्मण व
हनुमान तक सिमट नहीं सकते,
वे प्रेम के हर रंग को समेटते हैं,
और वैसे ही
रामचरितमानस
अधूरा है
बिना भरत के भ्रातृ-प्रेम के,
बिना केवट के निश्छल भक्ति के,
बिना शबरी के अनवरत प्रतिक्षारत
विश्वास से बुहारे गये भक्ति मार्ग पर
बिछाए गये श्रद्धा के फूल और
प्रेम और ममता से जुठे हुए बेर के।
जिनके मन
जात-पात, ऊँच-नीच, भेद-भाव से
ओतप्रोत हों,
वहाँ प्रेम कहाँ!
वहाँ राम कहाँ!
फिर,
वे क्या रामचरितमानस गायेंगे?
वे तो बस
अपनी-अपनी गाल बजाएंगे,
बस अपनी राग सुनाएंगे।
वे क्या राम-चरित्र बताएँगे!
                    ---------------- दिवाकर ।//30/04/16

गुरु-चेला !

इन्होंने कैसे झट से
"भ्रष्टाचार" के पाँव छू लिये !
इन्होंने एक घंटे
बंद कमरे में
भ्रष्टाचार की सीख
ग्रहण की है।
ये कहते हैं
कि आशीर्वाद मिला है इन्हें
"उनका"।
अब तो राजनीति में
इनका भविष्य उज्ज्वल है ।
जाते जाते
इन्होंने "उनको"
सामाजिक न्यायकर्ता की
उपाधि तक दे डाली !
अब तो कोई संदेह नहीं कि
इन्होंने वह परिपक्वता पा ली है,
जिससे ये
"उनका" अधूरा काम
अवश्य ही पूरा कर पायेंगे।
अगर
कोई जान पाये
कि "वे" बिहार को
कहाँ तक ले गए ,
तो वह जान ले
कि ये देश को
कहाँ तक ले जायेंगे !
--------------------------- दिवाकर ।//02/05/16

तिनके से तीर, हम।

सुबह
उठते हुए हम
तिनके होते हैं,
हल्के-हल्के,
डगमग-डगमग,
करते हैं ।
नित्यता की आँधी में
उड़ाए जाते हुए
हम
बहने लगते हैं
काले,
कठोर नदी में
जिसके कठोर बहाव में
रूकने पर
कुचले जाने का डर है ।
नित्यता ही
खिंचती है हमें बाहर
कुछ पल के लिए
और
फिर छोड़ देती है
नदी के
बहाव में बहने के लिए ।
दिन भर
बहते हुए
बहाव की दिशा में,
जब एक बार
वापसी का रूख करते हैं,
तब तिनके नहीं रहते,
तब हम तीर का रूप धरते हैं ।
नियति के धनुष पर
मन के धागे
के तनाव से
जब छुटते हैं,
तब
हर बहाव को
चिरते हुए
जब घर आते हैं,
तब कभी कभी अपनों
को ही चुभ जाते हैं ।
--------------------------दिवाकर ।//03/05/16

मन-का

मातृ-सत्ता ही है शाश्वत,
गर्भ से उसके- जहाँ,
पितृ-सत्ता की बजाते
फिरते हो क्यों डफलियाँ?
है जगत में प्रेम के रंगों
से रंगी हर फिजा,
चटख रंग "ममता" के आगे,
और रंग फिके यहाँ ।
-----------------------------दिवाकर ।//08/05/16

प्यार तुमने कब किया ?

प्यार तुमने कब किया ?
जलता हुआ दिया था जो,
अपनी लौ में मगन था वो,
उसको तो बस तुमने अपनी
मौजूदगी का हवा दिया।
प्यार तुमने कब किया ?

चाँद था अपने गगन का,
अपनी ही धून में मगन था,
तुमने बादल बनकर
उसको ढक लिया,
जग की नजरों से
उसे ओझल किया।
प्यार तुमने कब किया !

साँझ का अंतिम पहर था,
आगोश में सारा शहर था,
जिसको देखा हमसफर था,
साथ उसके तुमने
कुछ पल हो लिया ।
प्यार तुमने कब किया ?

था समंदर का किनारा,
लहरों की बदमाशियाँ,
शोर की जिद में ही
जिद्दी हो गयी खामोशियाँ।
फिर कहना क्या, क्या सुनना
एक दूसरे का,
बस होंठों का हिलना
नजर मिलना- सब खारा हुआ,
जान न पाए समंदर ने
किसे प्यासा किया ?
प्यार तुमने कब किया ?

कहते हैं सब है शुरू
वहीं से यह सिलसिला,
पर नहीं उतरा जो मन में,
क्या वजूद उसका भला !
दिल ही जाने-
क्या जिया ? कितना जिया ?
प्यार तुमने कब किया ?
               --------------------दिवाकर ।//15/05/16

चलें गाँव इस बार ।

चलो मन,
चलें गाँव इस बार।
वहाँ सुनहरे खेतों से भी
हो जाता है प्यार ।

चारों ओर मखमली फसलें,
बीच में अपना गाँव,
मन तू धीरे धीरे रखना
अपने बेकल पाँव।

टेढ़ी मेढ़ी आर खेत की
चल ले जो एक बार
मिट्टी छू दिल में उतरेगी
सोंधी-उर्ध्व-सुवास।

गोद बिछाए गाँव बुलाए
जैसे माँ का प्यार ।
धैर्य न खोना,
अभी समझना बाकी है व्यवहार ।

मिट्टी के घर पक्के हो गये,
पक्की हो गयीं सड़कें ।
मगर कुछ सपने कच्चे रह गये
सबके पक्की करके ।

सारा गाँव पेट भर सोया,
जागा एक गलीचा,
थाली खाली आँख में धँस गयी,
रात भर पेट को भूख ने फींचा।

आज की पूनम रात,
मेरे मन,
खेत यहाँ चमचम करते हैं,
ऐसी एक रात को
सारे शहर तरसते हैं ।
कल है काली रात अमावस,
कल तक रूक जाना,
श्याम-श्वेत यहां की यादें
साथ लिये जाना ।

आ ही गई अमावस वाली
काली काली रात,
काले चादर में लिपटा है
सारा गाँव-सरात ।
फसलों पर बिछ गयी है
जाने कहीं से काली राख।
अभी-अभी कुछ हुआ कोलाहल
उसी गलीचे में ,
दीपक एक जल रहा
फूस की छत के नीचे में ।
चीख चिरती है सन्नाटा
कोई तो है बात।
कहीं किसी को डस ना ले
यह काली-लंबी-नागीन रात।

सुबह का सूरज लाल रक्त सा,
खींच रहा था श्वास ,
दौड़ा भागा मैं जा पहुँचा
उसी गलीचे पास।
गाँव की नजरें अटक गयी थी
जहाँ पड़ी थी लाश,
रात मौत की नींद सो गया
लगा गले में फांस।
कितनी रात और भूखे सोता
फसलों का विश्वास ।
पिछे छोड़ गया वह अपने
कुछ और जिन्दा लाश।

अब जब गाँव से निकल रहे हम,
दिखा आर न खेत,
पाँव हमारे भाग रहे थे,
मिट्टी तो भई रेत।
-------------------------दिवाकर ।//23/05/16

मन-का

यूँ खुरदुरा होता गया इन्सान,
गिली मिट्टी की
चिकनाहट भूल गया ,
ईंट-पत्थरों से
रच डाला अपना मकान ।
भूल गया वह
गले मिलने के दिन,
गले उतारने की बातों से
चटख लाल है हर जुबान ।
                      -----------------दिवाकर ।
                      01/06/2016

बेचारे! डूब गये !

मुँह बंद किए हुए
धँसे जा रहे हैं
दलदल में,
बिना पुकारे
किसी मददगार को
तरसते हुए ।
पाँव से कमर तक,
फिर कमर से कंधे तक,
अब कंधे से भी ऊपर
अपनी ही छटपटाहट
से कसते हुए ।
फिर भी
आँखें बचाकर
देखने की कोशिश करते हैं
कि कहीं कोई
देख न ले
हमें फँसते हुए,
दलदल में
धिरे-धिरे धँसते हुए ।
हद ही हो गयी हो तो
इतना कर लें
मरें अगर तो मरें
खुद पे हँसते हुए ।
   -------------------- दिवाकर ।//07/06/2016

मन-का

वफादारी निभाते दिखाते
जाने कब वह गुलाम हो गया,
पता चला कि कोई
हजार कुत्तों वाला निजाम हो गया ।
                 -------------------------दिवाकर ।
                                     07/06/2016