Tuesday, 26 July 2016

मेरी-तबियत-घर की

फिर, मेरी तबियत बिगड़ी है ।

घर के भीतर बिखरी
अपनी ही चीजें
समेट रहा था ,

कि खबर आई
दहलीज की
फिर कुछ ईंटें उखड़ी हैं ।

घर के आँगन में
एक चबूतरा है,
जिस पर बैठते थे सब,
अपनी अपनी बातें कहते थे,
सबकी बातें सुनते थे ।

उसमें पड़ चुकी हैं कई दरारें,
जो अपनों के ही प्रहार से उभरी हैं ।

चबूतरे की हो
या हो दहलीज की,
अपनी ही तो है हर ईंट।

सोच रहा हूं -
कहीं तो नहीं,
बाहर-भीतर चोट करें जो
- दोनों हाथें -
एक ही देह ने पकड़ी हैं !

फिर, मेरी तबियत बिगड़ी है ।
--------------------------------------- दिवाकर ।
                                   //28/02/16

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