सुबह
उठते हुए हम
तिनके होते हैं,
हल्के-हल्के,
डगमग-डगमग,
करते हैं ।
नित्यता की आँधी में
उड़ाए जाते हुए
हम
बहने लगते हैं
काले,
कठोर नदी में
जिसके कठोर बहाव में
रूकने पर
कुचले जाने का डर है ।
नित्यता ही
खिंचती है हमें बाहर
कुछ पल के लिए
और
फिर छोड़ देती है
नदी के
बहाव में बहने के लिए ।
दिन भर
बहते हुए
बहाव की दिशा में,
जब एक बार
वापसी का रूख करते हैं,
तब तिनके नहीं रहते,
तब हम तीर का रूप धरते हैं ।
नियति के धनुष पर
मन के धागे
के तनाव से
जब छुटते हैं,
तब
हर बहाव को
चिरते हुए
जब घर आते हैं,
तब कभी कभी अपनों
को ही चुभ जाते हैं ।
--------------------------दिवाकर ।//03/05/16
Saturday, 23 July 2016
तिनके से तीर, हम।
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