घर मेरा धड़कता है
आजकल,
एक नन्ही सी
धड़कन के साथ ।
नन्हे-नन्हे पैरों की
थिरकन में
खो जाता है -
घर में बे-घर होने
का एहसास ।
नन्हे- नन्हे हाथों की
थपकियाँ
दिवारें खोल देती हैं ।
कोमल होंठों से
नवजात से निकलते हैं शब्द-
आर्द्रता में लिपटे,
सिमटे-सिमटे,
सकुचे-सकुचे-
घर के रोम-रोम को
तर कर देते हैं ।
नन्हीं-चमकीली आँखें
जिधर निहार भर लेती हैं,
घर वहीं रौशन हो जाता है ।
वह
घर के कोने कोने में
दिल सा बहता रहता है
कि,
उसका घर में होना ही
घर का पूरा होना है ।
उसको जब-जब मैं
गोद में लेता हूं,
मन-दर्पण में
बार बार निहारता हूं-
तो पाता हूं-
अपने ही अंबर में
चाँद चमक रहा है ।
--------------------------दिवाकर ।//13/03/16
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