फूल केवल फूल नहीं होता,
उसका एक रंग होता है -
तुम्हें शायद पसंद न हो।
उसमें एक खुशबू होती है -
तुम्हें शायद न भाती हो।
उसकी पंखुड़ियाँ होती हैं -
उनसे एलर्जी ही हो तुम्हें ।
फूल के साथ
काँटे भी हो सकते हैं,
और हो सकते हैं पत्ते भी -
कुछ हरे,
तो कुछ सुखे भी।
तो क्या!
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है तुम्हें ।
फूल को जो चाहे कहो,
बदरंग कहो,
दुर्गंध कहो,
नीरस कहो,
काँटे कहो,
सूखा झाड़ कहो।
मगर
मत कहना
उसे तोड़ने की बात,
क्योंकि
तब माली चुप न रहेगा,
अड़ेगा, लड़ेगा, मरेगा,
मगर
फूल की पीड़ा
अब और न सहेगा।
------------दिवाकर ।//18/02/16
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