कोई राम से मिला हो
तो बताना,
किसी ने सीता के साथ
आँसू बहाए हों तो
मिलाना,
किसी ने तुलसीदास से
कोई चर्चा की हो तो
जरा मेरी परिचय कराना
उससे,
कि मैं जानना चाहता हूं
राम से रामचरितमानस हुआ
या कि
रामचरितमानस से राम !
आज न राम हैं,
न ही सीता,
न ही हैं तुलसीदास,
है तो बस रामचरितमानस,
जिसे पढ़नेवाले
बस कुछ पंक्तियाँ पढ़कर
गढ़ लेते हैं
अपने-अपने राम,
अपनी-अपनी सीता,
और फिर
मचाते हैं शोर
जिसमें रामचरितमानस के
चौपाइयों की मिठास
करूण क्रंदन बन जाती है ।
बस राम-रावण युद्ध की
चित्कार गुंजती है
जिसमें गूंगे हो जाते हैं-
भरत, केवट, शबरी
जैसे अनमोल पात्र।
राम केवल सीता, लक्ष्मण व
हनुमान तक सिमट नहीं सकते,
वे प्रेम के हर रंग को समेटते हैं,
और वैसे ही
रामचरितमानस
अधूरा है
बिना भरत के भ्रातृ-प्रेम के,
बिना केवट के निश्छल भक्ति के,
बिना शबरी के अनवरत प्रतिक्षारत
विश्वास से बुहारे गये भक्ति मार्ग पर
बिछाए गये श्रद्धा के फूल और
प्रेम और ममता से जुठे हुए बेर के।
जिनके मन
जात-पात, ऊँच-नीच, भेद-भाव से
ओतप्रोत हों,
वहाँ प्रेम कहाँ!
वहाँ राम कहाँ!
फिर,
वे क्या रामचरितमानस गायेंगे?
वे तो बस
अपनी-अपनी गाल बजाएंगे,
बस अपनी राग सुनाएंगे।
वे क्या राम-चरित्र बताएँगे!
---------------- दिवाकर ।//30/04/16
Saturday, 23 July 2016
राम-चरित्र-मानस
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