Saturday, 23 July 2016

बेचारे! डूब गये !

मुँह बंद किए हुए
धँसे जा रहे हैं
दलदल में,
बिना पुकारे
किसी मददगार को
तरसते हुए ।
पाँव से कमर तक,
फिर कमर से कंधे तक,
अब कंधे से भी ऊपर
अपनी ही छटपटाहट
से कसते हुए ।
फिर भी
आँखें बचाकर
देखने की कोशिश करते हैं
कि कहीं कोई
देख न ले
हमें फँसते हुए,
दलदल में
धिरे-धिरे धँसते हुए ।
हद ही हो गयी हो तो
इतना कर लें
मरें अगर तो मरें
खुद पे हँसते हुए ।
   -------------------- दिवाकर ।//07/06/2016

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