Saturday, 23 July 2016

मन-का

मातृ-सत्ता ही है शाश्वत,
गर्भ से उसके- जहाँ,
पितृ-सत्ता की बजाते
फिरते हो क्यों डफलियाँ?
है जगत में प्रेम के रंगों
से रंगी हर फिजा,
चटख रंग "ममता" के आगे,
और रंग फिके यहाँ ।
-----------------------------दिवाकर ।//08/05/16

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