Tuesday, 26 July 2016

माँ, तुम विदा मत होना ।

हाँ,
तुम मूर्तरूप में
बैठती हो
हर वर्ष
हर चौक-चौराहे पर।
परंतु
अमूर्तरूप में
कहीं नहीं
कहीं भी नहीं-
न वाणी में
न ही विचार में ।
हाँ,
तुम्हारे विसर्जन से पहले ही
विसर्जित हो जाते हैं-
लोक-लाज,
नंगी हो जाती है सभ्यता,
उन अश्लील गीतों में
जो बजाये जाते हैं
तुम्हारे विसर्जन-जुलूस में
और उन गीतों पर
सरे-बाजार नाचती हैं
बहकी हुई बेशर्म कुन्ठाएँ
शहर भर की।
हाँ,
तुम्हारी मूर्ति-विसर्जन से पहले ही
विसर्जित कर दी जाती है
मर्यादा उस पवित्रता की
जिसे "माँ " कहते हैं ।
कड़वा सच है
कि तुम्हारी अमूर्त-रूप-दर्शनार्थ
न कोई योग्य द्रृष्टि बची है,
न ही तुम्हें पुकारने के योग्य
कोई जिह्वा।
हाँ,
जिह्वा, जिसने
"माँ" और "बहन" शब्दों की
मर्यादा भंग की
प्रयुक्त कर गालियों में,
अन्यथा
तुम्हारी अमूर्तता तो
अवश्य ही विद्यमान होती है
हर एक माँ में,
जो
परिलक्षित नहीं होती है
अयोग्य द्रृष्टि से।
हाँ,
द्रृष्टि
जिसने नहीं देखी
माँ की आँखों के कोने में
अटकी अश्रु-बूँद को,
नहीं महसूस की
उसकी विवशता को,
माँ की सिकुड़ी भौहों के नीचे
आँखों में ममता की छलछलाहट
नहीं देखी।

हाँ,
जिसके कदम ठिठके हैं
माँ की खामोशी भरी विदाई से,
जिसके हृदय ने ही पुकारा हो
माँ को कई बार
और खामोशी भी
रोक नहीं पायी हो उसे
माँ का हृदय छूने से,
वे सरस्वती-पुत्र जहाँ होंगे
वहीं विद्यमान होगी माँ
तुम अमूर्त रूप में ।
माँ ,
तुम वहां से विदा मत होना।

                         -----------दिवाकर ।//15/02/16

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