ये पन्ने -
जो जलाये जा रहे हैं वर्षों से,
जलते हुए पन्नों
की लपटों में
जल जाती हैं किताबें भी।
और
किताबों के सब पन्ने
एक से नहीं होते,
और एक से नहीं होते
उनमें अंकित
हर अक्षर,
हर शब्द,
हर पंक्तियाँ।
जरूरी नहीं कि
कि सब तुम्हें सही लगें-
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
यह भी है ।
ये पन्ने हैं-
पढ़ने वालों के लिए ।
पढ़ने दो उन्हें,
सोचने दो,
फिर करने दो विचार उन्हें-
किस सोच को जलाना है
या किस सोच को बचाना है ।
हो सके तो
अशिक्षा जलाओ।
पन्ने जलाने से
सिर्फ राजनीति होगी,
नेता बनोगे
और
सत्ता बदल बदलकर
पन्ने जलाते रहोगे।
---------------------------- दिवाकर ।//09/03/16
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