तुम हो अपनी भीड़ में,
हम हैं अपनी भीड़ में,
भीड़ के दायरों में
भेड़िए हम हो गये हैं ।
उठाते हैं उंगलियाँ भी तो-
लगती हैं खरोंचें-
एक दूसरे को।
अपने ही चित्कार में
हम खो गये हैं ।
कुछ तो जतन करके
निकलकर आएं बाहर
दायरों से,
कि-
अपने-अपने इंसानों के दुश्मन
हम क्यों हो गये हैं ?
खाल है जो भीड़ की
उसमें जलन है,
बेबसी है,
घूटन है,
घूट-घूट के इंसान मर न जाएँ,
कुछ भी करो
चिरो या फाड़ो,
बाहर निकालो,
साँस लेने दो इन्हें,
गले मिलने दो इनको
एक-दूसरे से।
मिलने-बिखरने दो इन्हें
एक-दूसरे में ।
देर होती है नहीं
जब तक संभल जाए कदम,
होश में आओ
कि भीड़ की साजिश है यह,
इंसान का दम घूटता है जहाँ,
हम ऐसी भीड़ के
क्यों हो गये हैं ।
भीड़ ही बस भीड़ हो,
इंसान न हो कोई जहाँ,
ऐसे क्या जय देश की,
या कि,
जयमाला में उसके भी
"विवशता", हम पिरो गये हैं ।
----------------------------------दिवाकर ।//27/03/16
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