Saturday, 23 July 2016

चलें गाँव इस बार ।

चलो मन,
चलें गाँव इस बार।
वहाँ सुनहरे खेतों से भी
हो जाता है प्यार ।

चारों ओर मखमली फसलें,
बीच में अपना गाँव,
मन तू धीरे धीरे रखना
अपने बेकल पाँव।

टेढ़ी मेढ़ी आर खेत की
चल ले जो एक बार
मिट्टी छू दिल में उतरेगी
सोंधी-उर्ध्व-सुवास।

गोद बिछाए गाँव बुलाए
जैसे माँ का प्यार ।
धैर्य न खोना,
अभी समझना बाकी है व्यवहार ।

मिट्टी के घर पक्के हो गये,
पक्की हो गयीं सड़कें ।
मगर कुछ सपने कच्चे रह गये
सबके पक्की करके ।

सारा गाँव पेट भर सोया,
जागा एक गलीचा,
थाली खाली आँख में धँस गयी,
रात भर पेट को भूख ने फींचा।

आज की पूनम रात,
मेरे मन,
खेत यहाँ चमचम करते हैं,
ऐसी एक रात को
सारे शहर तरसते हैं ।
कल है काली रात अमावस,
कल तक रूक जाना,
श्याम-श्वेत यहां की यादें
साथ लिये जाना ।

आ ही गई अमावस वाली
काली काली रात,
काले चादर में लिपटा है
सारा गाँव-सरात ।
फसलों पर बिछ गयी है
जाने कहीं से काली राख।
अभी-अभी कुछ हुआ कोलाहल
उसी गलीचे में ,
दीपक एक जल रहा
फूस की छत के नीचे में ।
चीख चिरती है सन्नाटा
कोई तो है बात।
कहीं किसी को डस ना ले
यह काली-लंबी-नागीन रात।

सुबह का सूरज लाल रक्त सा,
खींच रहा था श्वास ,
दौड़ा भागा मैं जा पहुँचा
उसी गलीचे पास।
गाँव की नजरें अटक गयी थी
जहाँ पड़ी थी लाश,
रात मौत की नींद सो गया
लगा गले में फांस।
कितनी रात और भूखे सोता
फसलों का विश्वास ।
पिछे छोड़ गया वह अपने
कुछ और जिन्दा लाश।

अब जब गाँव से निकल रहे हम,
दिखा आर न खेत,
पाँव हमारे भाग रहे थे,
मिट्टी तो भई रेत।
-------------------------दिवाकर ।//23/05/16

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