Tuesday, 26 July 2016

"जोगी" मन रंगना

अबकी फागून
तन मत रंगना,
जोगी
मन रंगना।

आँधी, अंधड़ शोर कर रहे
सूखे पत्ते, धूल, भर रहे,
मूरझाए सब-
थे हरे-भरे ।
सूखा पड़ा है
प्रेम का अंगना,
जोगी मन रंगना।

उसका आना,
उसका जाना,
सब कुछ था
जाना पहचाना।
जबसे
टूट गए हैं कंगना,
उसका रहना
या न रहना,
सूना है अंगना।
जोगी मन रंगना।

हंस के लिए
पलकें बिछाईं,
कोयल कैसे
रास न आई,
अब कौओं की
काँव काँव से
फूर्र हुईं मैना ।
जोगी मन रंगना।

मन का आंगन
फिर से सजाना,
कोयल गाये गीत सुहाना,
फिर फिर आए बैठे मैना,
और खनके
खन खन खन कंगना।
जोगी मन रंगना।

अबकी फागून
तन मत रंगना,
जोगी
मन रंगना।
---------------दिवाकर//24/03/16

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