Monday, 20 March 2017

जनादेश


तुम्हारे बनाए चहारदीवारियों में
सजाए गए पिंजरों में कैद
बेचैन.... फड़फड़ाते......
पैर पटकते....चोंच मारते....
अंतिम कोशिश कर थके हारे.....
प्राणी भी सुनते हैं
तुम्हारे
आरामपसंद शरीर पर
फटे मुँह से निकलते
आजादी के भाषण

वे तुम्हारी दातों से नोचे जाते
मांस के टुकड़ों में
महसूस करते हैं
तुम्हारी दया
तुम्हारी करूणा
तुम्हारी भावनाओं की बास
तुम्हारे मूँह से
कोने कोने मे फैल जाती है....
गलाघोंटू

तुम्हें-
पत्थरों को भगवान
"जन-वरों" को गुलाम
बनाने की "लत" है

जान चुके हैं वे-
तुम पाल-पोसकर
एक दिन दबा दोगे उनका टेंटुवा
चढ़ा आओगे उनकी बोटियाँ
अपने भगवान पर
बाँटोगे अपनी बिरादरी में
स्वाद ले ले कर कहोगे
प्रसाद है यह

टेंटुवा दबाने वाले-
तुम्हें स्वच्छंदता की आवाज
कैसे समझ आएगी!

तुम नहीं समझ सकते
"जनादेश"-
यह जान चुके हैं "वे"
                -------------- दिवाकर।१४/०३/१७

Sunday, 12 March 2017

मन-का


शर्त लगालो!
तुम मुझे गुमराह नहीं कर सकते।
हाँ,
जब भी मिलोगे मुझसे,
मैं तुम्हें आईना दिखाऊंगा,
और
तुम भी दिखाना
मुझेे आईना ।
"आईने के साथ मिलना"
मेरी शर्त है।

आईना निष्पक्ष होता है,
--क्या मेरा,
--क्या तूम्हारा !
         ------------- दिवाकर ।०१/०८/१६

मन-का


मैं खोया-खोया सा
हूँ आजकल-

दिल में ही
दिलवर का
दिदार करता हूँ,
आजकल -
अपने दिल में ही
बिहार करता हूँ ।

चाँद आसमान में
नहीं है आजकल ।
     --------------------दिवाकर ।०६/०८/१६

ऐ मेरे दोस्त!


तेरे मौजुदगी का एहसास,
मेरे दोस्त
मेरे विश्वास की आँच है,
जो आँखों से ढलकते
आंसुओं को सोख जाती है।

भोर में खुलते
फूलों की पंखुड़ियों से
छिटकतीं ओस की बुन्दें
हैं तेरी दोस्ती,
मोतियों की तरह
बिखर जाती हैं
मेरे मुस्कराते ही
हर पल मेरे गालों से।

जहाँ कदम लड़खड़ाने लगते हैं
चलते चलते,
वहीं तेरे हाथ बढ़ आते हैं
सहारा देने।
हो न हो कोई फरिस्ता है तू
खुदा का मेरे लिए ।

खून के रिश्ते भी
दिवार बना लेते हैं।
शायद
खून के रंग का रिश्ता है
तेरे-मेरे दरमेयां-
जैसा कि
आकाश और समुन्दर
के बीच होता है-
कभी जो गौर करोगे तो पाओगे-
किस तरह आकाश
समुन्दर में समा जाता है।
     ------------------------- दिवाकर।०७/०८/१६

Happy Friendship Day to All.....

श्रद्धा का प्रतिबिंब!


उनके घर में
प्रवेश करते ही
मैंने सिंह पर सवार माँ की
सुनहरे चौखटों वाली
बड़े फ्रेम में मढ़ी
एक बड़ी तस्वीर देखी।
देखा, तस्वीर में
माँ भी शांत थीं,
सिंह भी शांत था।

तस्वीर के ठीक बगल में
बैठे थे वह और मैं -
कि बात बढ़ी।
बात बात की बात में ही,
मजाकिया मुस्कान में
हल्का बुदबुदाते हुए
उनके मुख से
कुछ यूँ निकले शब्द -
माँ??????-
जो कि अपशब्द थे।

मैं हतप्रभ हो
घर में चारों ओर देखा -
तीसरा कौन था वहाँ?
किसके लिए थे ये अपशब्द?
फिर देखा-
माँ की तस्वीर को-
माँ अब भी शांत थीं,
सिंह अब भी शांत था।

सहसा
इस बार
तस्वीर के शीशे में  दिखे-
वह और मैं -
कि मेरी
नजरें झुक गयीं।

वे थे कि
अब भी बोले जा रहे थे-
थे आदत से लाचार ।
और मैं था कि
मेरा मन शोर कर रहा था-
हो चुका था बीमार ।
बाकी
माँ अब भी शांत थीं,
सिंह अब भी शांत था।
       -------------------------दिवाकर ।०९/०८/१६

अब सब बहुरूपिया


लड़कपने में
बहुरूपिया को देखकर
भागकर छूप जाते थे
कभी अपनों के ओट लेकर,
कभी घर के किसी कोने में ।
उसके जाने का आभास होते ही
उसको जाते देखना
सुकून देता था।
उसके आने का समाचार
भय मिश्रित कौतूहल का एहसास ही रहा
हमेशा।

अब
जब
सब
हूए जा रहे हैं
बहुरूपिया ।
छुपने को नहीं बचा
कोई जगह -
न घर,
न गाँव,
न देश ।
तब
अब
बदल रहा हूँ
मैं भी
अपना वेश ।
बन रहा हूँ
मैं भी
बहुरूपिया ।

अब
छुपने की जरूरत नहीं
कहीं भी,
कभी भी।
अब किसी का
आना या जाना-
कोई भय नहीं,
कोई कौतूहल नहीं ।

परंतु अब
सुकून-
कभी नहीं,
कहीं नहीं-
कि
लड़कपने वाला बहुरूपिया
भीतर से इंसान होता था
परंतु
अब का -
बाहर से इंसान
और भीतर से होता है-
बहुरूपिया।

अब
सब
हो गये हैं -
बहुरूपिया,
और
मैं भी।
   --------------- दिवाकर ।०९/०८/१६

सुनैना


आजादी की
सत्तरवीं सालगिरह में
सुनैना जी रही है
जिन्दगी का बावनवाँ साल।

उसके काम अब
उसके लड़के करते हैं ।
जो काम पहले बीस फीट की
एक बाँस की फट्टी करती थी,
उसी काम के लिए
जोड़नी पड़ती हैं तीन-चार फट्टियाँ।

आज सुनैना नाप रही है
अपने कांपती ऊंगलियों और
अपनी धुंधलाती नजरों से
उन फट्टियों को जोड़कर
उनकी लंबाई -
वे भी बीस से बावन,
बावन से सत्तर के हो गए हैं ।

आजादी के बाद
ऊँची और-ऊँची
होती गयीं अट्टालिकाएँ,
और उनके साथ
लम्बी होती गयीं -
बाँस की फट्टियाँ।
सुनैना तो वहीं रह गयी
अपनी झुग्गी-झोपड़ी में
अपने बच्चों के साथ।
वह बूढ़ी होती गयी और
बच्चे बड़े,
किन्तु
उनके हाथ से
नहीं छूटीं तो बस,
बाँस की फट्टियाँ ।

आज
बाँस की फट्टियाँ
बाँधते-जोड़ते हुए
सुनैना का लड़का बोला-
"माँ क्यों न हम भी इसी
फट्टी और रस्सी से तिरंगा फहराएँ!"
सुनैना ने त्यौरियाँ चढ़ाते और
मुँह बिचकाते हुए कहा-
"छीः छी: क्या बकता है रे तू!
तुझे पता भी है कि
कितना पवित्र होता है तिरंगा,
और ये फट्टियाँ, रस्सियाँ -
कितनी अपवित्र?"

आज
उसकी बस्ती में
तिरंगा फहराया गया है,
लंबे सीधे-तने बाँस से बंधा
तिरंगा खूब लहरा रहा है-
ऊंचाईयों पर जमीनी हकीकत
का भारीपन नहीं रह जाता,
तब जैसी जिधर की बयार
वैसी ऊधर की उन्मुक्तता ।

फहराता तिरंगा नहीं दिखता
सुनैना के लड़के को।
दिखता है सीधा-तना लंबा खड़ा
मजबूत बाँस।
सोचता है-
सीधी लंबी नाली के लिए
बहुत कारगर होगी
इस बाँस की फट्टी।
कि तभी कौंध जाती है
लड़के के कानों में -
माँ की आवाज -
पवित्र-अपवित्र।
लड़का मन ही मन में
बुदबुदाता है -
"हुंह, पवित्र! यही तो वह बला है,
जिसने बना दिया है हमें -
अपवित्र और अछूत।"
लड़के ने
बुदबुदाते हूए यूँ मुंह बनाया
कि पवित्रता के
उसके हृदय में
कई फोड़े-फुंसी ऊग आए हैं,
जो बस फूट आएंगे अभी -
कि आजाद देश का मैला साफ करते-करते
अपवित्र हो गयी,
अछूत हो गयी-
माँ आज भी सू-नैना है ,
परंतु
आजाद नहीं ।
      ------------------- दिवाकर ।१६/०८/१६

तु.प्रे.मे


युगों की है उलझन
तुम्हारी जुल्फो में,
थोड़ा सुलझा लो कि,
कुछ लम्हें बिखर जाएँ ।

सुना है-
मोतियों का खजाना
है छिपा समंदर में।
थोड़ा साहिल को मिले कि
वह भी सँवर जाए।
    ---------------------- दिवाकर ।/१८/०८/१६

याद में


जब आदत सी हो जाए
घर में उनके न होने की,
चलो मन
घर के सूनेपन से
बंधवा लेते हैं राखी,
चलो आज घर का दर्द भी
साझा कर लें ।
--------------------- दिवाकर ।१८/०८/१६

तु.प्रे.में


जिस दिन से आपके हाथ
अपने हाथों में लिया,
एक-दूसरे में हाथों की
लकीरें उलझ गयीं,
अब लगाइए मेंहदी,
तो ऐसे लगाइए -
कलम मेंहदी की, आप
दोनों तरफ से खुली रखिए।
                               --------------------- दिवाकर ।१८/०८/१६

तु.प्रे.में


उस पल से,
जब तुम्हारे कांधे से
सरका था दुपट्टा,
उस पल से,
जब हमारे दरमियाँ
बस हमारी साँसों का शोर था,
बाकी सब सन्नाटा,
उस पल से,
जब हमारी धड़कनों ने
एक राग छेड़ा था,
उसी पल से
तुमने ओढ़ा है -
मेरे साँसों का दुपट्टा।

कभी अपनी धड़कनों की सुनना
कि वे जानती हैं -
मेरी साँसों ने
कितने बारीकियों से बुना है
इश्क का रिश्ता ।
जरा खयाल रखना कि
मेरी रूह
उन धागों के बीच
बड़े इत्मिनान से फँसी है।
मेरी साँसों का आना-जाना
कि रहे दूपट्टा सजीव,
यह सिर्फ मेरे हिस्से की दास्ताँ नहीं,
तुम्हारा हिस्सा है-
तुम्हारी स्वीकृति-
मेरी साँसों के लिए-
तुम्हारे साँसों की।
  --------------------------------दिवाकर ।१९/०८/१६

मन-का


सारी राह मुझे दुनिया टेढ़ी-मेढ़ी नजर आई,
सारी राह किसी ने भी नहीं गौर किया मेरा चश्मा।
मैं चुप रहा कि मैं
अजनबी ही रहा यहाँ ,
वे चुप रहे कि उनका
यहीं रहा आशियाँ।
              ----------------------------------- दिवाकर । २१/०८/१६

मन-का


सीने में आग है तो
जलनी ही चाहिए,
मगर संघर्ष की आँच देकर ।
यूँ मुंह में गालियाँ भरकर -
जहाँ-तहाँ थूकने से क्या होगा? -
गंदगी फैलेगी,
होगा कैंसर -
आत्महत्या क्यों!

सच तो यह है कि
आग थी ही नहीं तुम में,
दिखावा था सिर्फ ।
सच तो यह है कि
तुम पानी हो गए हो, पानी!
थोड़ी सी आँच क्या लगेगी,
उड़ जाओगे!
धिक्कार है !

वीर, तो
धीर और गम्भीर होते हैं-
बड़बोले नहीं,
होते हैं -
मन व जुबान से साफ।

कभी आईने में देखना
अपना मुंह,
साफ करने की जरूरत है।
आईने को दोष मत देना,
वह तो साफ है।
देखना
वह-
जिसने पकड़ रखा है आईना,
वही बदलाव के होंगे-
अग्रदूत ।
वे ही एक दीपक को
हजार करेंगे ,
एक चिंगारी को
मशाल करेंगे ।
   --------------------दिवाकर ।२२/०८/१६

बे-जुबान


बीच राह में
सरक रहा था चींटा,
लोग ऊसपर से
हो गुजरते गये,
पैरों तले कुचल कुचल कर
तड़प रहा था चींटा।
किसी की भी नजर
नहीं पड़ी उसपर,
तड़प-तड़प कर
मर रहा था चींटा।

बेजुबान था-
चीख कैसे सुनता कोई,
किसी के पाँव पड़ा, पाँव तले-
मसला जा रहा था चींटा।
मरकर के अपने ही देह में
गड़ा जा रहा था चींटा।

वही आँधी-
जिसने उड़ा के उसे
यहाँ बीच राह फेंका था,
उसी आँधी के दामन की
धूल बन
उड़ा जा रहा था चींटा।
         ------------------ दिवाकर ।२३/०८/१६

मन-का


मेरा कृष्ण
आज
कचड़े से प्लास्टिक चुनता है ,
और बच जाती है गाय
प्लास्टिक खाने से।

मेरा राम,
आज भी
अपने दोस्त -
अनवर, गुरमीत और जाॅन
के साथ एक ही थाली में
खाता है,
एक ही बाॅटल से
पानी पीता है ।

अवकाश में ये सभी
जब एक साथ
किसी बड़े मैदान में
एक-दूसरे के हाथ पकड़कर
गोल चक्कर बनाकर
खेलते हैं,
तब सारा मैदान
उनके घेरे में
सीमटता नजर आता है,
और फिर सारा ब्रह्मांड -
जैसे वहीं सुरक्षित हो।

वर्षों से इंतजार कर रहा हूँ -
जाने कब बड़े होंगे ये,
कि उद्धार मांगता है संसार
एक बार फिर ।
कौन हैं वे लोग -
जो इन्हें बड़ा नहीं होने देते?
कहीं वे अपने ही तो नहीं!
            ------------------------ दिवाकर ।२३/०८/१६

मन-का-मोहन


मोहन
के एक हाथ से बाँसुरी
व दूसरे हाथ से मोर-मुकूट
लेकर
अपने लाडले को
जन्माष्टमी के फैशन-शो
के लिए तैयार कर
विदा करते हुए
मालकिन ने गौर नहीं किया-
मोहन तो घर में ही छूट गये ।
            ------------------------- दिवाकर ।२५/०८/१६

तुम्हारी पीड़ा में ......


तुम्हारी पीड़ा बाँटने को
मेरे पास वक्त नहीं शेष,
बिक चुका है मेरा वक्त
चंद कौड़ियों के भाव,
अब
मैं बाँटता हूँ चंद कौड़ियाँ,
मैंने इनकी खनखनाहट में
तुम्हारे क्रन्दन को गुम होते देखा है।
जब
कौड़ियों की खनखनाहट
गुम होने लगे,
जब तुम्हारे घाव
हो जाएँ नासूर ,
तब बहा देना उन्हें,
कि
साथ-साथ बह जाएगा
मेरा वक्त (तुम्हारे लिए ),
कि तुम्हें कुछ राहत तो मिले!
        ----------------------------- दिवाकर ।०२/०९/१६

तीज


यह व्रत
जो तुमने रखी
मेरे लम्बी उमर
जीने के लिए,
कुछ खालीपन सा है
सदियों से इसमें,
भरने के लिए ।

आओ न, मिलकर
इसमें कुछ अपनापन भर लें,
मिलकर यह व्रत कर लें
एक दूसरे पर
उमर भर
मरने के लिए ।
         ----------------- दिवाकर ।०४/०९/१६

लड़का/वाला


तुम्हारा लड़का होना
और
तुम्हारे कारण
कुछ लोगों का लड़कावाला होना,
बन चुका है धब्बा ,
अब और इसपर
कालीख न पुतवाओ-
तो अच्छा हो।
बीक चुके हो कब के,
अब अपनी
निलामी न करवाओ-
तो अच्छा हो।

यूँ तो
लड़खड़ाने वालों के लिए
लाठी का सहारा
काफी है,
तुम्हें-
जो तनकर चलने की
आदत है
लाठी न तुड़वाओ-
तो अच्छा हो।

सर झुकाना
तुम्हारी आदत में सुमार नहीं,
फिर भी
ठोकर खाकर ही सही
आदत से बाज आ जाओ-
तो अच्छा हो।
        ---------------- दिवाकर ।१३/०९/१६

?/शासन


भेड़िया बाहर आ गया है,
कुछ बोलता है तो
कुत्ते आपस में
भौंकने लगते हैं ।

आदमी!
बटन दबाते ही मर गया।

चुनाव के बाद -
कुछ कुत्ते पालतू निकल गये।

भेड़िये की ओट में खड़े
एक कुत्ते के मुँह से
टपक रहा खून -
ताजा है।
     -------------- दिवाकर ।१४/०९/१६

प्यार करने का...........


अधूरा ही रहे ताजिन्दगी
मेरा प्यार तेरे नाम का,
प्यार करने का सलीका यह भी है।

प्यार में मरना बहुत आसान है,
प्यार में तन्हा भी जी ले जिन्दगी,
प्यार करने का सलीका यह भी है।

हर कदम हो हाथ उनका हाथ में- जरूरी नहीं,
याद थामे भी कदम कुछ नाप लें,
प्यार करने का सलीका यह भी है।

दास्तान है साथ मरने की बहुत
साथ जीने की बना ले दास्तान,
प्यार करने का सलीका यह भी है।

प्यार में बन जाया करते हैं महल,
आसमाँ का छत सजालें प्यार में,
प्यार करने का सलीका यह भी है।

प्यार को सबने बनाया है खुदा,
प्यार का इंसान बना लें गर जहाँ में
प्यार करने का सलीका यह- जरूरी है।
               --------------------------------- दिवाकर ।१८/०९/१६

ख्वाब.....


हर एक ख्वाब अधूरा रह जाए....
तो रह जाए
ख्वाब को ख्वाब मानने का
ख्वाब तो पूरा हो जाए

वह जिन्दगी भर चेहरे पर
मलाल मल के चलता रहा

बंद पलकों के सामने जो अच्छा था
दिखता है वही बूरा तो बूरा हो जाए।

ख्वाब और जिन्दगी में
ख्वाब का फासला रहा
           ....................... दिवाकर।१०/१०/१६

विसर्जन


विसर्जन के पहले
माता की मूर्ति के सम्मुख
भीड़ में
माता को अंतिम प्रणाम कर
भीड़ से बाहर आती हुई माँ
के पैरों का शत्-शत् नमन
करता हुआ मैं
माँ के साथ ही
भीड़ का विसर्जन कर
बाहर निकल आया।

माता की प्राण-प्रतिष्ठा के बाद
माता का विसर्जन
मूरत सी काठ हुई-
भीड़ ही कर सकती थी।
             ------------------- दिवाकर ।११/१०/१६

दशहरा


रावण हर बार
तैयार हो जाता है जलने को
हर बार जलने के बाद
चेष्टा रहती है उसकी-
जल जाए उसके भीतर बैठा राम
उसकी लपटों में

विद्वान की मूढ़ता
जलाती है
उकसाती है
बार बार जलने को

भीतर और बाहर से
जलाते राम
रावण की
अनंत व्यथा हैं ।
     ------------------ दिवाकर ।१२/१०/१६

बजा लो ताली


भाई सब सही है,...खाली
है न वही बात,...बच्चों वाली,
किसी को एक पन्ना था नापसंद...
तो पुरी किताब जलाली,
कोई चार पदों से हो परेशान...
चरित्र पर मढ़ता फिरता है गाली,
लो फिर कुछ सवाल...
हाँ बस चंद सवालों से...
अपनी जीभ जलाली........,
अपनी आवाज बंद कराली।
............... गौर करो तो
अपना-अपना भरकर पेट..
बाद में सभी बजाते फिरते हैं...
लोकतंत्र की खाली थाली।......

भाई भीड़ लगी है....कौवों की
गाते हैं सब लोकतांत्रिक कव्वाली...
आप भी कर लो काँव-काँव....
आप भी बजा लो ताली।
           ....................... दिवाकर।

मैं NDTV पर लगे रोक का विरोध करता हूँ.......। मैं हर भीड़तंत्र का विरोध करता हूँ।.....०५/११/१६

नंगा-नाच


सबने बाँट लिया है
अपना-अपना पहलू,
बार-बार नचा दिया जाता है सिक्का,
सबको है संशय-
सिक्के के रूकते ही
भंग हो सकता है उनका अभिनय-
मेल-मिलाप का,
दोनों ही नाचतेे हैं-
आदमी और सिक्का-
बारी-बारी से,
सिक्के का रूकना-
अभिनय है नियति का,
विश्वास का,
आस्था का ........,
ऐसे में ही
भय कर जाता है-
नंगा-नाच,
और आदमी
बस देखता रह जाता है ।
                          ******** दिवाकर /१३/११/१६

विरोध-व्यापार


"बंद" चाहिए इन्हें -
इनका दिमाग -
भूसा भरा है जिसमें
अब-जब-तब झर आता है-
कहीं भी कभी भी ।

इन्होंने कलम को खंजर बना
घोंप ली है अपनी अाँखों में
इस दर्द से कहीं अधिक दर्दनाक है
इनके लिए
देख लेना यथार्थ नंगी आँखों से

डटे रहो तुम-
हिमालय हो-
छान लेते हो हवाएँ भी
उनमे से संजिवनी छू कर आनेवाली
मरहम बने
उन आँखों की
तुम्हारी आँखों से बहती गंगा भी
यही चाहती है न

मगर सच्चाई यह भी है
कि तुम्हारी चोटियाँ छूती घटायें
जब जब गरजती हैं
ये थर्रा जाते हैं बार बार
और जब बरसती हैं
तो हलचल भी होती है यहीं-
कि ये हैं आदत से लाचार-
हो न हो इन्हें तो करना है-
विरोध-व्यापार ।
            ............... दिवाकर ।२९/११/१६

एहसास...यह भी


उस दीवार में
ठोकी गई कील से
आज तक टंग चुके होंगे
कितने कैलेंडर
उन उतरते टंगते कैलेंडरों से
कील मे होती हरकत भर है
नये साल का एहसास
उस दीवार को

बुढ़ी होती दीवार में
दरारें आ रही हैं
कील ढिली पड़ती जा रही है
एक दिन दीवार ढह जाएगी भरभराकर
तब कैलेंडर को मिलेगी
टंगने के लिए
फिर एक नयी दीवार
कील ठोक दी जाएगी
उसके सीने मे।
      ---------------- दिवाकर।०२/०१/१७

ख्वाहिश खामोशी की


उन कागजों पे मेरा नाम लिख देना
जिन कागजों का कोई काम ना हो
जहाँ सन्नाटा मिले वहीं फैंक देना
कि कुछ आहट ही हो
यूँ चुपचाप जाऊँ-
मुझपे यह ईल्जाम ना हो।
               ...................... दिवाकर। ०८/०१/१७

अपना सा


बहुत मुश्किल से मिलता है
कोई अपना सा

नहीं तो जहां सारा
तैरता रहता है इन नजरों में
बस सपना सा

निगाहे भिगी सी
मन का तड़पना सा

मंदिर तो बहाना है
किसी को कौन सा भगवान मनाना है!
बस पल पल का लेखा-जोखा ही
बिखरा-उलझा-सुलझा
मोती मन-का माला जपना सा

एक होना उसका पानी है
ना होना
आग मे तपना सा

चाँद नजर को बेहतर है
रात सुकून सी
दिन बेचैन सा
सूरज आँखों को झपना सा।

तुम बिन जीवन
बस नपना सा।
            ---------------- दिवाकर।२१/०१/१७

मन-का


उसने पहन रखा है
अपनेपन का मुखौटा
उघड़ जाए तो
बहुरूपिया मिलेगा

इंसान खींच कर फेंका जा चुका है-
चौक-चौराहों पर-
भूखा-नंगा

इंसान की आँखें
धीरे धीरे मूंद रही हैं
बहुरूपिया घूर रहा है
आँखें फाड़ फाड़ कर।
             ------------------ दिवाकर । २४/०१/१७

नयी तस्वीर

कोई भीड़ का हुआ
किसी की भीड़ हो गई
आज "गणतंत्र" की
यही तकदीर हो गई

सरकार गरीबों के
मसीहों की है यहाँ
रात पेट भर के
गहरी नींद सो गयी

वह भुखे पेट
जागा है रात भर
आज बेचता है
तिरंगा भीड़ में

खो जाएगी जब भीड़
देशभक्ति की धून में
वह भीड़ से अलग
पेट भर के खाएगा

तिरंगा है बेचैन
नहीं भीड़ पर नजर
सिर उठा कर ढूंढता है
उसी को इधर-ऊधर-
अब भी  कहीं वह
भुखे पेट तो नहीं!

भीड़ से घीरा
फड़फड़ा रहा था जो
मुस्कान उसकी देख
लहरा रहा है वह

आज के लिए
कहीं भीड़ से अलग
गणतंत्र की यही
नयी तस्वीर हो गयी।
             .................. दिवाकर।२६/०१/१७

जहाँ तुम मिलोगे

ऐसा लगता है
पिछे सूरज चल रहा है
आगे अंधेरा-
इतना गहरा-
मेरी परछाईं नहीं सुझती मुझे

मैं-
पिछे नहीं चल सकता
मुड़ कर देखता हूँ-
कितने साफ नजर आते हो तुम-
असंख्य किरणों से नहाए हुए
बाहें फैलाए हुए

मैं
छूटता जा रहा हूँ तुमसे
तुम
मुझसे

तुम्हारी आँखों में
छूट चुका है-
चाँद-
मेरे अंधेरे का

काश!
ऐसा होता-
सूरज आगे चला जाता
और
मैं
गुम हो जाता
अंधेरे में
वापस
तुम्हारी बाहों में

याद है न तुम्हें!
तुम अंधेरे से मिले थे मुझे
तुम्हारी बाहों से लिपटकर
मूंद ली थी मैने आँखें

खिंचा जाऊँ अंधेरे से
या
ढकेला जाऊँ अंधेरे में
जहाँ जहाँ तुम मिलोगे
वहीं मिलूंगा मैं
छूटा हुआ-
थोड़ा-थोड़ा
वहीं
छनकर
बिखरा मिलेगा सूरज
तुम्हारे पनाह मे
             --------------- दिवाकर। २९/०१/१७

मन-का

लकीरें जन्मजात नही थीं
इन्हें तुमने खींचा है
धरती की देह पर
लहुलुहान किया है उसे
युद्ध आह है उसी पीड़ा की
भोगना ही होगा उसे

तुमने माँ कहकर
बार बार हरे किए हैं उसके घाव
                         ------------------ दिवाकर। ०२/०३/१७

एक रंग

रंग एक ही
मजहबों से इतर
सरहदों से बेखबर
क्या इंसान क्या जानवर
सबमे प्रवाहमान- प्राणाधार
इसे जानना मानना
व्यवहार मे ढालना
भी एक होली ही है
         
एक-दुसरे को बाँटने वाली
उस हर दीवार की
होलिका जलेगी
जोगी जी
मन की होली
यूँ ही मनेगी
           .......... दिवाकर। १२/०३/१७