आजादी की
सत्तरवीं सालगिरह में
सुनैना जी रही है
जिन्दगी का बावनवाँ साल।
उसके काम अब
उसके लड़के करते हैं ।
जो काम पहले बीस फीट की
एक बाँस की फट्टी करती थी,
उसी काम के लिए
जोड़नी पड़ती हैं तीन-चार फट्टियाँ।
आज सुनैना नाप रही है
अपने कांपती ऊंगलियों और
अपनी धुंधलाती नजरों से
उन फट्टियों को जोड़कर
उनकी लंबाई -
वे भी बीस से बावन,
बावन से सत्तर के हो गए हैं ।
आजादी के बाद
ऊँची और-ऊँची
होती गयीं अट्टालिकाएँ,
और उनके साथ
लम्बी होती गयीं -
बाँस की फट्टियाँ।
सुनैना तो वहीं रह गयी
अपनी झुग्गी-झोपड़ी में
अपने बच्चों के साथ।
वह बूढ़ी होती गयी और
बच्चे बड़े,
किन्तु
उनके हाथ से
नहीं छूटीं तो बस,
बाँस की फट्टियाँ ।
आज
बाँस की फट्टियाँ
बाँधते-जोड़ते हुए
सुनैना का लड़का बोला-
"माँ क्यों न हम भी इसी
फट्टी और रस्सी से तिरंगा फहराएँ!"
सुनैना ने त्यौरियाँ चढ़ाते और
मुँह बिचकाते हुए कहा-
"छीः छी: क्या बकता है रे तू!
तुझे पता भी है कि
कितना पवित्र होता है तिरंगा,
और ये फट्टियाँ, रस्सियाँ -
कितनी अपवित्र?"
आज
उसकी बस्ती में
तिरंगा फहराया गया है,
लंबे सीधे-तने बाँस से बंधा
तिरंगा खूब लहरा रहा है-
ऊंचाईयों पर जमीनी हकीकत
का भारीपन नहीं रह जाता,
तब जैसी जिधर की बयार
वैसी ऊधर की उन्मुक्तता ।
फहराता तिरंगा नहीं दिखता
सुनैना के लड़के को।
दिखता है सीधा-तना लंबा खड़ा
मजबूत बाँस।
सोचता है-
सीधी लंबी नाली के लिए
बहुत कारगर होगी
इस बाँस की फट्टी।
कि तभी कौंध जाती है
लड़के के कानों में -
माँ की आवाज -
पवित्र-अपवित्र।
लड़का मन ही मन में
बुदबुदाता है -
"हुंह, पवित्र! यही तो वह बला है,
जिसने बना दिया है हमें -
अपवित्र और अछूत।"
लड़के ने
बुदबुदाते हूए यूँ मुंह बनाया
कि पवित्रता के
उसके हृदय में
कई फोड़े-फुंसी ऊग आए हैं,
जो बस फूट आएंगे अभी -
कि आजाद देश का मैला साफ करते-करते
अपवित्र हो गयी,
अछूत हो गयी-
माँ आज भी सू-नैना है ,
परंतु
आजाद नहीं ।
------------------- दिवाकर ।१६/०८/१६