बहुत मुश्किल से मिलता है
कोई अपना सा
नहीं तो जहां सारा
तैरता रहता है इन नजरों में
बस सपना सा
निगाहे भिगी सी
मन का तड़पना सा
मंदिर तो बहाना है
किसी को कौन सा भगवान मनाना है!
बस पल पल का लेखा-जोखा ही
बिखरा-उलझा-सुलझा
मोती मन-का माला जपना सा
एक होना उसका पानी है
ना होना
आग मे तपना सा
चाँद नजर को बेहतर है
रात सुकून सी
दिन बेचैन सा
सूरज आँखों को झपना सा।
तुम बिन जीवन
बस नपना सा।
---------------- दिवाकर।२१/०१/१७
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