Sunday, 12 March 2017

अपना सा


बहुत मुश्किल से मिलता है
कोई अपना सा

नहीं तो जहां सारा
तैरता रहता है इन नजरों में
बस सपना सा

निगाहे भिगी सी
मन का तड़पना सा

मंदिर तो बहाना है
किसी को कौन सा भगवान मनाना है!
बस पल पल का लेखा-जोखा ही
बिखरा-उलझा-सुलझा
मोती मन-का माला जपना सा

एक होना उसका पानी है
ना होना
आग मे तपना सा

चाँद नजर को बेहतर है
रात सुकून सी
दिन बेचैन सा
सूरज आँखों को झपना सा।

तुम बिन जीवन
बस नपना सा।
            ---------------- दिवाकर।२१/०१/१७

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