सबने बाँट लिया है
अपना-अपना पहलू,
बार-बार नचा दिया जाता है सिक्का,
सबको है संशय-
सिक्के के रूकते ही
भंग हो सकता है उनका अभिनय-
मेल-मिलाप का,
दोनों ही नाचतेे हैं-
आदमी और सिक्का-
बारी-बारी से,
सिक्के का रूकना-
अभिनय है नियति का,
विश्वास का,
आस्था का ........,
ऐसे में ही
भय कर जाता है-
नंगा-नाच,
और आदमी
बस देखता रह जाता है ।
******** दिवाकर /१३/११/१६
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