कोई भीड़ का हुआ
किसी की भीड़ हो गई
आज "गणतंत्र" की
यही तकदीर हो गई
सरकार गरीबों के
मसीहों की है यहाँ
रात पेट भर के
गहरी नींद सो गयी
वह भुखे पेट
जागा है रात भर
आज बेचता है
तिरंगा भीड़ में
खो जाएगी जब भीड़
देशभक्ति की धून में
वह भीड़ से अलग
पेट भर के खाएगा
तिरंगा है बेचैन
नहीं भीड़ पर नजर
सिर उठा कर ढूंढता है
उसी को इधर-ऊधर-
अब भी कहीं वह
भुखे पेट तो नहीं!
भीड़ से घीरा
फड़फड़ा रहा था जो
मुस्कान उसकी देख
लहरा रहा है वह
आज के लिए
कहीं भीड़ से अलग
गणतंत्र की यही
नयी तस्वीर हो गयी।
.................. दिवाकर।२६/०१/१७
No comments:
Post a Comment