सीने में आग है तो
जलनी ही चाहिए,
मगर संघर्ष की आँच देकर ।
यूँ मुंह में गालियाँ भरकर -
जहाँ-तहाँ थूकने से क्या होगा? -
गंदगी फैलेगी,
होगा कैंसर -
आत्महत्या क्यों!
सच तो यह है कि
आग थी ही नहीं तुम में,
दिखावा था सिर्फ ।
सच तो यह है कि
तुम पानी हो गए हो, पानी!
थोड़ी सी आँच क्या लगेगी,
उड़ जाओगे!
धिक्कार है !
वीर, तो
धीर और गम्भीर होते हैं-
बड़बोले नहीं,
होते हैं -
मन व जुबान से साफ।
कभी आईने में देखना
अपना मुंह,
साफ करने की जरूरत है।
आईने को दोष मत देना,
वह तो साफ है।
देखना
वह-
जिसने पकड़ रखा है आईना,
वही बदलाव के होंगे-
अग्रदूत ।
वे ही एक दीपक को
हजार करेंगे ,
एक चिंगारी को
मशाल करेंगे ।
--------------------दिवाकर ।२२/०८/१६
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