Sunday, 12 March 2017

जहाँ तुम मिलोगे

ऐसा लगता है
पिछे सूरज चल रहा है
आगे अंधेरा-
इतना गहरा-
मेरी परछाईं नहीं सुझती मुझे

मैं-
पिछे नहीं चल सकता
मुड़ कर देखता हूँ-
कितने साफ नजर आते हो तुम-
असंख्य किरणों से नहाए हुए
बाहें फैलाए हुए

मैं
छूटता जा रहा हूँ तुमसे
तुम
मुझसे

तुम्हारी आँखों में
छूट चुका है-
चाँद-
मेरे अंधेरे का

काश!
ऐसा होता-
सूरज आगे चला जाता
और
मैं
गुम हो जाता
अंधेरे में
वापस
तुम्हारी बाहों में

याद है न तुम्हें!
तुम अंधेरे से मिले थे मुझे
तुम्हारी बाहों से लिपटकर
मूंद ली थी मैने आँखें

खिंचा जाऊँ अंधेरे से
या
ढकेला जाऊँ अंधेरे में
जहाँ जहाँ तुम मिलोगे
वहीं मिलूंगा मैं
छूटा हुआ-
थोड़ा-थोड़ा
वहीं
छनकर
बिखरा मिलेगा सूरज
तुम्हारे पनाह मे
             --------------- दिवाकर। २९/०१/१७

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