उसने पहन रखा है
अपनेपन का मुखौटा
उघड़ जाए तो
बहुरूपिया मिलेगा
इंसान खींच कर फेंका जा चुका है-
चौक-चौराहों पर-
भूखा-नंगा
इंसान की आँखें
धीरे धीरे मूंद रही हैं
बहुरूपिया घूर रहा है
आँखें फाड़ फाड़ कर।
------------------ दिवाकर । २४/०१/१७
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