लड़कपने में
बहुरूपिया को देखकर
भागकर छूप जाते थे
कभी अपनों के ओट लेकर,
कभी घर के किसी कोने में ।
उसके जाने का आभास होते ही
उसको जाते देखना
सुकून देता था।
उसके आने का समाचार
भय मिश्रित कौतूहल का एहसास ही रहा
हमेशा।
अब
जब
सब
हूए जा रहे हैं
बहुरूपिया ।
छुपने को नहीं बचा
कोई जगह -
न घर,
न गाँव,
न देश ।
तब
अब
बदल रहा हूँ
मैं भी
अपना वेश ।
बन रहा हूँ
मैं भी
बहुरूपिया ।
अब
छुपने की जरूरत नहीं
कहीं भी,
कभी भी।
अब किसी का
आना या जाना-
कोई भय नहीं,
कोई कौतूहल नहीं ।
परंतु अब
सुकून-
कभी नहीं,
कहीं नहीं-
कि
लड़कपने वाला बहुरूपिया
भीतर से इंसान होता था
परंतु
अब का -
बाहर से इंसान
और भीतर से होता है-
बहुरूपिया।
अब
सब
हो गये हैं -
बहुरूपिया,
और
मैं भी।
--------------- दिवाकर ।०९/०८/१६
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