बीच राह में
सरक रहा था चींटा,
लोग ऊसपर से
हो गुजरते गये,
पैरों तले कुचल कुचल कर
तड़प रहा था चींटा।
किसी की भी नजर
नहीं पड़ी उसपर,
तड़प-तड़प कर
मर रहा था चींटा।
बेजुबान था-
चीख कैसे सुनता कोई,
किसी के पाँव पड़ा, पाँव तले-
मसला जा रहा था चींटा।
मरकर के अपने ही देह में
गड़ा जा रहा था चींटा।
वही आँधी-
जिसने उड़ा के उसे
यहाँ बीच राह फेंका था,
उसी आँधी के दामन की
धूल बन
उड़ा जा रहा था चींटा।
------------------ दिवाकर ।२३/०८/१६
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