रंग एक ही
मजहबों से इतर
सरहदों से बेखबर
क्या इंसान क्या जानवर
सबमे प्रवाहमान- प्राणाधार
इसे जानना मानना
व्यवहार मे ढालना
भी एक होली ही है
एक-दुसरे को बाँटने वाली
उस हर दीवार की
होलिका जलेगी
जोगी जी
मन की होली
यूँ ही मनेगी
.......... दिवाकर। १२/०३/१७
No comments:
Post a Comment