Sunday, 12 March 2017

विरोध-व्यापार


"बंद" चाहिए इन्हें -
इनका दिमाग -
भूसा भरा है जिसमें
अब-जब-तब झर आता है-
कहीं भी कभी भी ।

इन्होंने कलम को खंजर बना
घोंप ली है अपनी अाँखों में
इस दर्द से कहीं अधिक दर्दनाक है
इनके लिए
देख लेना यथार्थ नंगी आँखों से

डटे रहो तुम-
हिमालय हो-
छान लेते हो हवाएँ भी
उनमे से संजिवनी छू कर आनेवाली
मरहम बने
उन आँखों की
तुम्हारी आँखों से बहती गंगा भी
यही चाहती है न

मगर सच्चाई यह भी है
कि तुम्हारी चोटियाँ छूती घटायें
जब जब गरजती हैं
ये थर्रा जाते हैं बार बार
और जब बरसती हैं
तो हलचल भी होती है यहीं-
कि ये हैं आदत से लाचार-
हो न हो इन्हें तो करना है-
विरोध-व्यापार ।
            ............... दिवाकर ।२९/११/१६

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