रावण हर बार
तैयार हो जाता है जलने को
हर बार जलने के बाद
चेष्टा रहती है उसकी-
जल जाए उसके भीतर बैठा राम
उसकी लपटों में
विद्वान की मूढ़ता
जलाती है
उकसाती है
बार बार जलने को
भीतर और बाहर से
जलाते राम
रावण की
अनंत व्यथा हैं ।
------------------ दिवाकर ।१२/१०/१६
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