Sunday, 12 March 2017

दशहरा


रावण हर बार
तैयार हो जाता है जलने को
हर बार जलने के बाद
चेष्टा रहती है उसकी-
जल जाए उसके भीतर बैठा राम
उसकी लपटों में

विद्वान की मूढ़ता
जलाती है
उकसाती है
बार बार जलने को

भीतर और बाहर से
जलाते राम
रावण की
अनंत व्यथा हैं ।
     ------------------ दिवाकर ।१२/१०/१६

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