Sunday, 12 March 2017

श्रद्धा का प्रतिबिंब!


उनके घर में
प्रवेश करते ही
मैंने सिंह पर सवार माँ की
सुनहरे चौखटों वाली
बड़े फ्रेम में मढ़ी
एक बड़ी तस्वीर देखी।
देखा, तस्वीर में
माँ भी शांत थीं,
सिंह भी शांत था।

तस्वीर के ठीक बगल में
बैठे थे वह और मैं -
कि बात बढ़ी।
बात बात की बात में ही,
मजाकिया मुस्कान में
हल्का बुदबुदाते हुए
उनके मुख से
कुछ यूँ निकले शब्द -
माँ??????-
जो कि अपशब्द थे।

मैं हतप्रभ हो
घर में चारों ओर देखा -
तीसरा कौन था वहाँ?
किसके लिए थे ये अपशब्द?
फिर देखा-
माँ की तस्वीर को-
माँ अब भी शांत थीं,
सिंह अब भी शांत था।

सहसा
इस बार
तस्वीर के शीशे में  दिखे-
वह और मैं -
कि मेरी
नजरें झुक गयीं।

वे थे कि
अब भी बोले जा रहे थे-
थे आदत से लाचार ।
और मैं था कि
मेरा मन शोर कर रहा था-
हो चुका था बीमार ।
बाकी
माँ अब भी शांत थीं,
सिंह अब भी शांत था।
       -------------------------दिवाकर ।०९/०८/१६

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