Monday, 20 March 2017

जनादेश


तुम्हारे बनाए चहारदीवारियों में
सजाए गए पिंजरों में कैद
बेचैन.... फड़फड़ाते......
पैर पटकते....चोंच मारते....
अंतिम कोशिश कर थके हारे.....
प्राणी भी सुनते हैं
तुम्हारे
आरामपसंद शरीर पर
फटे मुँह से निकलते
आजादी के भाषण

वे तुम्हारी दातों से नोचे जाते
मांस के टुकड़ों में
महसूस करते हैं
तुम्हारी दया
तुम्हारी करूणा
तुम्हारी भावनाओं की बास
तुम्हारे मूँह से
कोने कोने मे फैल जाती है....
गलाघोंटू

तुम्हें-
पत्थरों को भगवान
"जन-वरों" को गुलाम
बनाने की "लत" है

जान चुके हैं वे-
तुम पाल-पोसकर
एक दिन दबा दोगे उनका टेंटुवा
चढ़ा आओगे उनकी बोटियाँ
अपने भगवान पर
बाँटोगे अपनी बिरादरी में
स्वाद ले ले कर कहोगे
प्रसाद है यह

टेंटुवा दबाने वाले-
तुम्हें स्वच्छंदता की आवाज
कैसे समझ आएगी!

तुम नहीं समझ सकते
"जनादेश"-
यह जान चुके हैं "वे"
                -------------- दिवाकर।१४/०३/१७

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