Tuesday, 26 July 2016

"अंतर्वेदना"

हम हवाओं के भरोसे
किताब-ए-जिंदगी के
पन्ने पलटते रह गये।
आंधियाँ आयीं
किताबें ही
उड़ा कर ले गयीं ।

जो किताबों में लिखा था
पढ़ न पाए हम कभी।
अक्षरों की रौशनी में
चौंधियाए रह गये ।

फड़फड़ाकर रह गये
पन्नों में अपने ख्वाब सारे।
होश में आए तो
खालिस जिल्द तड़पती रही।

जब मिला उनसे-
जिसने पढ़ा मुझको कभी।
अपनी किताबों में
वे अपना मुंह छिपाए चल दिये।

-------------------------दिवाकर ।//22/03/16

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