Tuesday, 26 July 2016

दिल्ली से आते हुए,

दिल्ली से आते हुए,
कुछ खाली सा हो गया है ।
वहाँ जो घट भर गया था
मुहाने तक,
छलछला गया था,
बज उठेगा जैसे
फूट-फूटकर,
कोई बजादे बस
दिल्ली से आते हुए ।
जो बचा है भीतर-
बेचैन है यह सोचकर
कि
यूँ भी ईश्वर किसी से
रूठता क्यों है?
किसीको आस होती है
गहरी किसीकी
उसे वह 
क्यों कभी मिलता नहीं है ।

दिल्ली से आते हुए
थोड़ा सा खुद को
वहीं छोड़ आया हूं,
जो बचा हूं-
बेचैन हूं,
दिल्ली से आते हुए ।
--------------------------दिवाकर ।//02/04/16

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