दुर होकर भी वे
उतने ही करीब होते हैं।
जागते हैं हम उनकी यादों मे,
ख्वाब उनके ही भरे नयनों में
हम सोते हैं।
वे मेरे चाँद,
मेरा प्यार गहरा आसमां,
दोनों हैं अधूरे सही
एक-दूसरे के बिना ।
शांत सागर में
ज्यूं लहरें उमड़ के आती हैं,
उनकी यादें यूं ही
मेरी धड़कनें बढ़ाती हैं ।
जिनसे मुलाकात नहीं
कितने दिनों से सही,
वे ही मेरे हर घड़ी -
हर पल में शरीक होते हैं ।
दूर होकर भी वे
उतने ही करीब होते हैं।।
वे हमसे दूर सही,
फिर भी वे दूर नहीं ,
हम हैं मजबूर मगर
दिल तो मजबूर नहीं।
वे ही कातिल हैं मेरे
वे ही मेरी चाहत-ए-जाँ,
दर्द देते हैं वही
वही करते हैं दवा।
कत्ल जिनका हुआ,
कातिल के मुरीद होते हैं,
दर्द जिनकी है दवा,
चाहत-ए-मरीज होते हैं।
दूर होकर भी वे
उतने ही करीब होते हैं।
--------------दिवाकर
//25/02/15
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